[Intro]
खेतों की धुन, सुबह की शांति
[Verse 1]
रमेश हूँ किसान, खेत मेरी पहचान
हल थामे सुबह चला, मिट्टी से बनी आदत
ज़मीन फिसली पाँव डगमगाए, फिर भी दिल रहा तैयार
[Chorus]
जीवन भी खेत जैसा, कभी सीधी कभी फिसलन
हिम्मत हल के साथ, मिट्टी से प्रेम बना चलन
किसान हार नहीं मानता, फिर से शुरू कर देता है काम
[Verse 2]
उठकर सीखा फिर से मिट्टी की ताकत
गिरा नहीं, संभला और चल पड़ा वापस चलने की राह
जीवन भी खेत जैसा है—चलना ही वीरता
[Chorus]
जीवन भी खेत जैसा, कभी सीधी कभी फिसलन
हिम्मत हल के साथ, मिट्टी से प्रेम बना चलन
किसान हार नहीं मानता, फिर से शुरू कर देता है काम
[Outro]
मिट्टी की गंध कहती—आगे बढ़ते चलो