[Intro]
धरा के किनारे, पुरानी कहानी से
अखियाँ नम हैं, गूंजता है ध्वनि-चिन्ह
[Verse 1]
विद्यालय के मैदान में चलती थी बात पुरानी,
कृष्ण-सुदामा की दोस्ती की निशानी आज भी याद है जानी.
भृगु ऋषि आये पाँव धरे, भिक्षा माँगी राहों में,
गुरु मां ने दो पोटलियाँ चने, भरे सुख के आंचल में।
[Chorus]
लोभ-लोभ व्यर्थ था क्यों, दिलों में जो डेरा डाला,
भिक्षा के बीच ही सीख मिली, करुणा ने आँचल फैलाया.
जो भीतर रहा खाली, उसने श्राप नहीं भुलाया,
जहाँ से नज़र बचाई, वहीं से मोर पंख खींच लाया।
[Verse 2]
वन की राह में पुष्प बिखरे, साथी थे छोटे-से वरदान,
गुरु मां ने कहा—अभी दे नहीं सकते, लेने दो सूर-आनंद।
भृगु ने दिव्य दृष्टि से देखा, दो पोटलियाँ चने की वही,
लोभ से बची रोटी का शब्द, बचपन की सच्ची कहानी वही।
[Pre-Chorus]
तुझमें जो माया है, वही तेरे कर्म का फल बन गया,
आधी रोटी भी कड़वी, पर सीख बन कर आ चुका है।
[Chorus]
लोभ-लोभ व्यर्थ था क्यों, दिलों में जो डेरा डाला,
भिक्षा के बीच ही सीख मिली, करुणा ने आँचल फैलाया.
जो भीतर रहा खाली, उसने श्राप नहीं भुलाया,
जहाँ से नज़र बचाई, वहीं से मोर पंख खींच लाया।
[Bridge]
पथ में सोचा हर बालक, क्या भोजन क्या आशा,
गुरु की ममता में छुपी, हर दया की राह सचा।
[Chorus]
लोभ-लोभ व्यर्थ था क्यों, दिलों में जो डेरा डाला,
भिक्षा के बीच ही सीख मिली, करुणा ने आँचल फैलाया.
जो भीतर रहा खाली, उसने श्राप नहीं भुलाया,
जहाँ से नज़र बचाई, वहीं से मोर पंख खींच लाया.
[Outro]
आज की प्रेरणा कहती है, दया से बढ़ते पहाड़ बनते,
कृष्ण-सुदामा की गाथा से, हर दिल नया पाठ सीखते।