[Intro]
मिट्टी की धुन में समय का सन्नाटा
[Verse]
मिट्टी के नीचे धूप बोई है, फसल बनेगी रात,
चुपचाप नदी ने सिखा दिया, लहरों का नया पाठ।
[Chorus]
अगर पुकारो साँझ के वक़्त, आऊँगा पाँव-पाँव,
राह की धूल लिपटी रहे, चाहे भर जाए चाँव,
घर तक लौट आऊँगा, एक गीत बन जाए।
[Verse]
धान की बालियों पर टंगा है, आसमान का हर कर्ज़,
गाँव की आँखों में शहर आज भी अजनबी फ़र्ज़।
[Bridge]
चूल्हे की आग हँसती है, दाँत जैसे नीले-से,
हांडी में उबलता स्वाद वही, भूले हुए कल-से।
[Chorus]
अगर पुकारो साँझ के वक़्त, आऊँगा पाँव-पाँव,
राह की धूल लिपटी रहे, चाहे भर जाए चाँव,
घर तक लौट आऊँगा, एक गीत बन जाए।